हाय यह घोर कलियुग,
न जाने कब लगेगा इस पर विराम,
आज सारा विश्व आपस में लड़ रहा है,
न जाने कब थमेगा यह कोहराम।
कोई ताकत के लिेए, कोई सत्ता के लिए,
संसार में आज गया है एक भीषण प्रलय।
विकास और उन्नति के नाम पर,
बनते जा रहे है यांत्रिक शस्त्रों के हिमालय।
बिम्बाणु-परमाणु के नाम तो अब सब के मुँह से फूटते है,
हर किसी की ज़ुबानी, आज 'ढाय-ढाय' को राह देती है,
प्रतिद्वंदिता की सीमाएँ पार कर, आज सभी अपनों से बैर कर रहे हैं,
अपनी जीत को देख, दूसरों के पिछड़ेपन से सभी ठिठक रहे हैं।
'बापू' की दृष्टि को आज अँधा बनाकर,
पृथ्वीलोक में क्रूर हाहाकार मच रहा है।
किंतु क्या किसीकी निगाह ने यह नहीं परखा,
कि इस क्रूरता की उमटती ज्वाला को कैसे बुझाया जा सकता है???

न जाने कब लगेगा इस पर विराम,
आज सारा विश्व आपस में लड़ रहा है,
न जाने कब थमेगा यह कोहराम।
कोई ताकत के लिेए, कोई सत्ता के लिए,
संसार में आज गया है एक भीषण प्रलय।
विकास और उन्नति के नाम पर,
बनते जा रहे है यांत्रिक शस्त्रों के हिमालय।
बिम्बाणु-परमाणु के नाम तो अब सब के मुँह से फूटते है,
हर किसी की ज़ुबानी, आज 'ढाय-ढाय' को राह देती है,
प्रतिद्वंदिता की सीमाएँ पार कर, आज सभी अपनों से बैर कर रहे हैं,
अपनी जीत को देख, दूसरों के पिछड़ेपन से सभी ठिठक रहे हैं।
'बापू' की दृष्टि को आज अँधा बनाकर,
पृथ्वीलोक में क्रूर हाहाकार मच रहा है।
किंतु क्या किसीकी निगाह ने यह नहीं परखा,
कि इस क्रूरता की उमटती ज्वाला को कैसे बुझाया जा सकता है???
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